आर्य समाज मत खण्डन,
दयानंद का कच्चा चिट्ठा,
दयानंदभाष्य खंडनम्,
दयानन्द कृत वेदभाष्यों की समीक्षा
दयानंद का कामशास्त्र | Dayanand Ka Kaamshastra
18:43 उपेन्द्र कुमार 'हिन्दू' 0 Comments
जिन
भड़वे समाजियों का उद्देश्य सनातन धर्म ग्रंथों के उदाहरणों को गलत संदर्भ में प्रस्तुत
करते हुए- धर्म के न जानने वालों के बीच भ्रम का भाव उत्पन्न कर उन्हें धर्म के मार्ग
से विमुख करना है सनातनधर्मियों को अपमानित करना व उन्हें नीचा दिखाना, धर्म विरोधीयों
की सहायता करना आदि हैं, उनके लिए सप्रेम --------------
(दयानंद कृत यजुर्वेदभाष्य, भाष्य-१)
पूषणं वनिष्ठुनान्धाहीन्स्थूलगुदया सर्पान्गुदाभिर्विह्लुत आन्त्रैरपो वस्तिना वृषणमाण्डाभ्यां वाजिनग्वगं शेपेन प्रजाग्वं रेतसा चाषान् पित्तेन प्रदरान् पायुना कूश्माञ्छकपिण्डैः॥ ~यजुर्वेद {अध्याय २५, मंत्र ७}
दयानंद
अपने यजुर्वेदभाष्य में इस मंत्र का अर्थ यह लिखते हैं कि---
हे मनुष्यों!
तुम मांगने से पुष्टि करने वालों को स्थूल गुदेंद्रियों के साथ वर्तमान, अंधे सर्पों
को गुदेंद्रियों के साथ वर्तमान विशेष कुटिल सर्पों को आंतों से, जलों को नाभि के नीचे
के भाग से, अंडकोष को आंडों से, घोडे के लिंग और वीर्य से संतान को, पित्त से भोजनों
को, पेट के अंगो को गुदेंद्रिय और शक्तियों से शिखावटों को निरंतर लेओं।
समीक्षक-- अब कोई इन नियोग समाजीयों से यह पूछे कि उन्हें दयानंद द्वारा किये गये
अधिकांश मंत्रो के ऐसे अर्थ अश्लील क्यों नहीं लगते? और जब इस वेद ऋचा की ही भांति
इन्हें अन्य सनातनी धर्म ग्रथों मे कोई श्रुति या श्लोक दिख जाता हैं तो अपनी बुद्धि
अनुसार ही उसके अर्थ का अनर्थ कर आप्त पुरूषों द्वारा रचित ग्रंथों का अपमान करते है
और उल्टा सनातनधर्मियों और उनके शास्त्रकारों को-- धूर्त, निशाचर, पाखंडी, नीच और न
जाने कितनी गालियाँ देते हैं,



