Popular Posts
-
आदिदेव नमस्तुभ्यं प्रसीद मम भास्कर । दिवाकर नमस्तुभ्यं प्रभाकर नमोऽस्तु ते ॥१॥ Aadi-Deva Namastubhyam Prasiida Mama Bhaaska...
-
॥ अथ यजुर्वेदः ॥ अध्याय 1 यजुर्वेदः-संहिता | अध्याय 1, मंत्र 1 इषे त्वा ऊर्जे त्वा । वायव स्थ । देवो वः ...
-
॥ अथ यजुर्वेदः ॥ अध्याय 40 यजुर्वेदः-संहिता | अध्याय 40, मंत्र 1 ईशा वास्यम् इदम् ̐ सर्वं यत् किं च जगत्यां जग...
-
॥ अथ ऋग्वेद: ॥ (ऋग्वेद-संहिता | प्रथम मण्डल, सुक्त १) ________________________________ अग्निमीळे पुरोहितं यज्ञस्य देवमृत्विजम् । ...
-
॥ अथ यजुर्वेदः ॥ अध्याय 3 यजुर्वेदः-संहिता | अध्याय 3, मंत्र 1 समिधाग्निं दुवस्यत घृतैर् बोधयतातिथिम् । आस्म...
-
॥ अथ ऋग्वेद: ॥ (ऋग्वेद-संहिता | दशम मण्डल, सुक्त १) ________________________________ अग्रे बृहन्नुषसामूर्ध्वो अस्थान्निर्...
-
वराहमिहिर (वरःमिहिर) ईसा की पाँचवीं-छठी शताब्दी के भारतीय गणितज्ञ एवं खगोलज्ञ थे। वाराहमिहिर ने ही अपने पंचसिद्धान्तिका में सबसे पहले ब...
-
॥ अथ यजुर्वेदः ॥ अध्याय 16 यजुर्वेदः-संहिता | अध्याय 16, मंत्र 1 नमस् ते रुद्र मन्यव ऽ उतो त ऽ इषवे नमः । ...
-
॥ अथ यजुर्वेदः ॥ अध्याय 31 यजुर्वेदः-संहिता | अध्याय 31, मंत्र 1 सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात् । ...
-
॥ अथ यजुर्वेदः ॥ अध्याय 36 यजुर्वेदः-संहिता | अध्याय 36, मंत्र 1 ऋचं वाचं प्र पद्ये मनो यजुः प्र पद्ये साम प्...
Labels
- Download Ebooks ( Veda Puran And Other Ebooks )
- Geeta Saar
- Guru Mantra
- Morning Mantras
- Rigved
- sri Suryadev
- अथर्ववेद
- आर्य समाज एवं नास्तिको को जवाब
- आर्य समाज मत खण्डन
- उपनिषद्
- ऋग्वेद
- चाणक्य नीति : Chanakya Neeti
- चुतियार्थ प्रकाश
- दयानंद
- दयानंद का कच्चा चिट्ठा
- दयानंदभाष्य खंडनम्
- दयानन्द कृत वेदभाष्यों की समीक्षा
- मनुस्मृति
- यजुर्वेद
- शतपथ ब्राह्मण
- श्रीमद्भगवद्गीता
- श्रीरामचरितमानस
- सत्यानाश प्रकाश
- सत्यार्थ प्रकाश का कच्चा चिठा
- सामवेद संहिता
- स्वामी विवेकानंद
आर्य समाज एवं नास्तिको को जवाब,
आर्य समाज मत खण्डन,
दयानंद का कच्चा चिट्ठा,
दयानंदभाष्य खंडनम्,
दयानन्द कृत वेदभाष्यों की समीक्षा
महर्षि या फिर महाचुतिया! | Mharishi Ya Fir Maha Chutiya
19:14 उपेन्द्र कुमार 'हिन्दू' 0 Comments
इस लेख
के माध्यम से मैं आप लोगों के सामने दयानंद कृत यजुर्वेदभाष्य के कुछ ऐसे भाष्य रख
रहा हूँ जिसे पढ़कर एक बार को आप लोगों की बुद्धि भी चकरा जायेगी आप लोगों को यही समझ
में नहीं आयेगा कि दयानंद के इन भाष्यों पर हंसें, क्रोधित हो या फिर दयानंद की मानसिक
स्थिति को लेकर दुख व्यक्त करें, इस लेख को लिखने का मेरा उद्देश्य सिर्फ इतना है कि
जो लोग दयानंद को संस्कृत का विद्वान समझते हैं, उन्हें यह पता होना चाहिए कि दयानंद
को संस्कृत तो छोडिये संस्कृत का 'स' भी नहीं आता था, या यह कहे कि उन्होंने संस्कृत
की कभी शक्ल तक न देखी होगी तो कहना गलत न होगा, और जब ऐसा मंदबुद्धि व्यक्ति वेदों
का भाष्य करने बैठ जाये तो अर्थ का किस प्रकार अनर्थ करता है, यह बताने की आवश्यकता
नहीं है, वह आपके सामने ही है देखिये--
(दयानंद कृत यजुर्वेदभाष्य, भाष्य-१)
होता यक्षद् अश्विनौ छागस्य हविष
ऽ आत्ताम् अद्य मध्यतो मेद ऽ उद्भृतं पुरा द्वेषोभ्यः पुरा पौरुषेय्या गृभो घस्तां
नूनं घासे ऽ अज्राणां यवसप्रथमानाम्ँ सुमत्क्षराणाम्ँ शतरुद्रियाणाम् अग्निष्वात्तानां
पीवोपवसानां पार्श्वतः श्रोणितः शितामत ऽ उत्सादतो ङ्गाद्-अङ्गाद् अवत्तानां करत एवाश्विना
जुषेताम्ँ हविर् होतर् यज॥ ~यजुर्वेद {२१/४३}
दयानंद
अपने यजुर्वेदभाष्य में इसका अर्थ करते हुए अपने लाडले शिष्यों के लिए फरमाते है कि--
“हे
(होत:) देनेहारे! जैसे, (होता) लेनेवाला,,,, (छागस्य) बकरा आदि पशुओं के, (मध्यत:)-
बीच से, (हविष:)- लेने योग्य पदार्थ, (मेद:)- अर्थात घी, दूध आदि,,,,,, (आत्ताम्) लेवें
वा,,,,, (नूनम्) निश्चय करकें, (घस्ताम्) खावें वा,,,,,, (हवि:) उक्त पदार्थों से खाने
योग्य पदार्थ का,,,,,, (जुषेताम्) सेवन करें”
आर्य समाज एवं नास्तिको को जवाब,
आर्य समाज मत खण्डन,
दयानंद का कच्चा चिट्ठा,
दयानंदभाष्य खंडनम्,
दयानन्द कृत वेदभाष्यों की समीक्षा
स्वामी दयानंद एकादश नियोग की देन | Swami Dayanand Aekadas Niyog KI Dain
19:10 उपेन्द्र कुमार 'हिन्दू' 0 Comments
सनातन
धर्म से भिन्न दयानंद द्वारा चलाए गये वेद विरुद्ध मतों में से एक मत है पशुधर्म नाम
से विख्यात “नियोग प्रथा” दयानंद ने अपने तथाकथित ग्रंथ “सत्यार्थ प्रकाश” में लगभग
पूरा एक समुल्लास इस पशुधर्म नियोग पर ही लिखा है, और वेदादि शास्त्रों के अर्थ का
अनर्थ कर अपने अनुयायियों के साथ साथ समस्त भारतवर्ष को इस महाअधर्म व्यभिचार नियोग नामक अंधकूप में धकेलने
का असफल प्रयास किया है, वेद मनुस्मृति आदि के अर्थ का अनर्थ कर नियोग सिद्ध किया है
जिससे धर्म के न जानने वाले लोगों में भ्रम की स्थिति उत्पन्न होती है, सो इस लेख के
माध्यम से मैं दयानंद के उन मिथ्या भाष्यों की धज्जियां उडाते हुए, प्रमाण के साथ यह
सिद्ध करकें दिखाऊंगा की दयानंद द्वारा चलाया यह पशुधर्म नियोग वेद विरुद्ध होने से मनुष्यों के लिए निषिद्ध है
अर्थात मनुष्यों को यह पशुधर्म त्यागने योग्य है, सो अब एक एक करकें दयानंद के उन सभी
वेद विरुद्ध भाष्यों का खंडन करते हैं जिनके अर्थ का अनर्थ कर दयानंद ने नियोग सिद्ध
किया है सुनिये--
(दयानंद कृत ॠग्वेदभाष्य, भाष्य-१)
सोम: प्रथमो विविदे गन्ध्र्वो विविद उत्तरः।
तृतीयो अग्निष्टे पतिस्तु रीयस्ते मनुष्यजाः॥
~ऋ० {मं० १०, सू० ८५, मं० ४०}
दयानंद
अपने ऋग्वेदभाष्य में इसका अर्थ यह लिखते हैं कि—
“हे स्त्री! जो (ते) तेरा (प्रथमः) पहला विवाहित (पतिः) पति तुझ को (विविदे)
प्राप्त होता है उस का नाम (सोमः) सुकुमारतादि गुणयुक्त होने से सोम जो दूसरा नियोग
होने से (विविदे) प्राप्त होता वह, (गन्धर्व:) एक स्त्री से संभोग करने से गन्धर्व,
जो (तृतीय उत्तरः) दो के पश्चात् तीसरा पति होता है वह (अग्निः)- अत्युष्णतायुक्त होने
से अग्निसंज्ञक और जो (ते) तेरे (तुरीयः) चौथे से लेके ग्यारहवें तक नियोग से पति होते
हैं वे (मनुष्यजाः) मनुष्य नाम से कहाते हैं | जैसा (इमां त्वमिन्द्र) इस मन्त्रा में ग्यारहवें पुरुष तक स्त्री नियोग
कर सकती है, वैसे पुरुष भी ग्यारहवीं स्त्री तक नियोग कर सकता है”
आर्य समाज एवं नास्तिको को जवाब,
आर्य समाज मत खण्डन,
दयानंदभाष्य खंडनम्,
दयानन्द कृत वेदभाष्यों की समीक्षा
नस्लभेदी जातिवादी “दयानंद” | Naslbhedhi Jativadi Dayanand
18:56 उपेन्द्र कुमार 'हिन्दू' 0 Comments॥पैदाइशी चुतिया प्रकरण॥
हमारे
दयानंदी गपोड़िये अक्सर एक बात कहते नहीं थकते कि दयानंद ने समाज में व्याप्त सामाजिक
कुरीतियों पर आक्रमण करते हुए, जातिवाद का विरोध किया, तथा कर्म के आधार पर वेदानुकूल
वर्ण-निर्धारण की बात कही, वे दलितोद्धार के पक्षधर थे, इसी प्रकार के और न जाने क्या
क्या गपोड़े मारते है, सो आज इस लेख के माध्यम से मैं इन सब बातों का खंडन कर, दयानंद
की जिहादी विचारधारा से आप लोगों को अवगत कराना चाहता हूँ, जिससे यह सिद्ध हो जायेगा
कि दयानंद दलितोद्धार के पक्षधर नहीं बल्कि दलितोद्धार के घोर विरोधी थे, समाज में
व्याप्त सामाजिक कुरीतियों नस्लभेद जातिवाद आदि को बढ़ावा देने वाले स्वामी दयानंद
ही थे, जो स्वयं दयानंद के ही द्वारा लिखे वेदभाष्य और लेखों से सिद्ध होता है देखिये--
(दयानंद कृत यजुर्वेदभाष्य, भाष्य-१)
अग्नये पीवानं पृथिव्यै पीठसर्पिणं
वायवे चाण्डालम् अन्तरिक्षाय वम्ँ शनर्तिनं दिवे खलतिम्ँ सूर्याय हर्यक्षं नक्षत्रेभ्यः
किर्मिरं चन्द्रमसे किलासम् अह्ने शुक्लं पिङ्गाक्षम्ँ रात्र्यै कृष्णं पिङ्गाक्षम्॥
~यजुर्वेद { ३०/२१}
दयानंद
अपने यजुर्वेदभाष्य में इसका अर्थ यह लिखते हैं कि---
“हे परमेश्वर वा राजन् !आप, (हर्यक्षम्)- बन्दर की सी छोटी आँखों वाले शीतप्राय देशी मनुष्यों को,,,,,,, (पिङ्गलम्)- पीली आँखोवाले को उत्पन्न कीजिये,,,,,, (चाण्डालम्)- भंगी को, (खलतिम्)- गंजे को,,,,,, (कृष्णम्)- काले रंगवाले, (पिङ्गाक्षम्))- पीले नेत्रों से युक्त पुरूष को दूर कीजिये”
आर्य समाज मत खण्डन,
दयानंद का कच्चा चिट्ठा,
दयानंदभाष्य खंडनम्,
दयानन्द कृत वेदभाष्यों की समीक्षा
दयानंद का कामशास्त्र | Dayanand Ka Kaamshastra
18:43 उपेन्द्र कुमार 'हिन्दू' 0 Comments
जिन
भड़वे समाजियों का उद्देश्य सनातन धर्म ग्रंथों के उदाहरणों को गलत संदर्भ में प्रस्तुत
करते हुए- धर्म के न जानने वालों के बीच भ्रम का भाव उत्पन्न कर उन्हें धर्म के मार्ग
से विमुख करना है सनातनधर्मियों को अपमानित करना व उन्हें नीचा दिखाना, धर्म विरोधीयों
की सहायता करना आदि हैं, उनके लिए सप्रेम --------------
(दयानंद कृत यजुर्वेदभाष्य, भाष्य-१)
पूषणं वनिष्ठुनान्धाहीन्स्थूलगुदया सर्पान्गुदाभिर्विह्लुत आन्त्रैरपो वस्तिना वृषणमाण्डाभ्यां वाजिनग्वगं शेपेन प्रजाग्वं रेतसा चाषान् पित्तेन प्रदरान् पायुना कूश्माञ्छकपिण्डैः॥ ~यजुर्वेद {अध्याय २५, मंत्र ७}
दयानंद
अपने यजुर्वेदभाष्य में इस मंत्र का अर्थ यह लिखते हैं कि---
हे मनुष्यों!
तुम मांगने से पुष्टि करने वालों को स्थूल गुदेंद्रियों के साथ वर्तमान, अंधे सर्पों
को गुदेंद्रियों के साथ वर्तमान विशेष कुटिल सर्पों को आंतों से, जलों को नाभि के नीचे
के भाग से, अंडकोष को आंडों से, घोडे के लिंग और वीर्य से संतान को, पित्त से भोजनों
को, पेट के अंगो को गुदेंद्रिय और शक्तियों से शिखावटों को निरंतर लेओं।
समीक्षक-- अब कोई इन नियोग समाजीयों से यह पूछे कि उन्हें दयानंद द्वारा किये गये
अधिकांश मंत्रो के ऐसे अर्थ अश्लील क्यों नहीं लगते? और जब इस वेद ऋचा की ही भांति
इन्हें अन्य सनातनी धर्म ग्रथों मे कोई श्रुति या श्लोक दिख जाता हैं तो अपनी बुद्धि
अनुसार ही उसके अर्थ का अनर्थ कर आप्त पुरूषों द्वारा रचित ग्रंथों का अपमान करते है
और उल्टा सनातनधर्मियों और उनके शास्त्रकारों को-- धूर्त, निशाचर, पाखंडी, नीच और न
जाने कितनी गालियाँ देते हैं,



