चुतियार्थ प्रकाश,
सत्यानाश प्रकाश,
सत्यार्थ प्रकाश का कच्चा चिठा
सत्यार्थप्रकाशान्तर्गत दशम समुल्लास की समीक्षा | Dasham Samullas Ki Samiksha
04:15 उपेन्द्र कुमार 'हिन्दू' 1 Comments
सत्यार्थप्रकाशान्तर्गत
दशम् समुल्लासस्य खंडनंप्रारभ्यते
सत्यार्थ
प्रकाश दशम समुल्लास पृष्ठ १११,
❝जो अति उष्ण देश हो तो सब
शिखा सहित छेदन करा देना चाहिये क्योंकि शिर में बाल रहने से उष्णता अधिक होती है और
उससे बुद्धि कम हो जाती है। डाढ़ी मूँछ रखने से भोजन पान अच्छे प्रकार नहीं होता❞
समीक्षक—
वाह रे भंगेडानंद वाह बस यही दो बातें लिखना शेष रह गया था, सो वह भी पुरा कर दिया,
थियोसोफिकल सोसायटी जैसी ईसाई मिशनरी सभा से प्रीती का असर साफ दिख रहा है तुम्हारी
सोच भी बिल्कुल ईसाइयों जैसी ही है बिल्कुल सफाचट, धर्म, कर्म, संस्कार सब धो ड़ाला,
जैसे तुम सन्यासी होकर शिखा डाढ़ी मूँछ नहीं रखते वैसे ही तुम चाहते हो सब हो जाएं,
अब यदि तुमको कोई वेदनिन्दक भी कहें तो उसका कहना अनुचित नहीं होगा, भारत में भी लगभग
छः महीने से अधिक उष्णता रहती है, तो फिर साफ लिख देना था कि छ: महीने को डाढ़ी मूँछ,
सर के बाल के साथ चूटिया तक मुंडवा दो, खास कर अपने चैलों को तो तुम यही आज्ञा करते
हो कि तुम लोग ईसाइयों की भांति शिखा सहित सिर के बाल मुंडवा दिया करों क्योकि अत्यधिक
गर्मी से बुद्धि कम हो जाती है, परन्तु तुम्हारी इस सत्यार्थ प्रकाश को देखकर विदित
होता है कि तुमने यह पुस्तक जरूर सर पर ऊनी वस्त्र बांधकर या फिर भट्टी में सर घुसेड़कर
लिखीं होगी, तभी बुद्धिहीनता की इतनी बातें लिखी है, चलों डाढ़ी मूँछ का तो तुमने यह
कारण बताया कि इससे खानपन अच्छी प्रकार नहीं हो पता, परन्तु शिखा से क्या हानि होती
है? वह तो खान पान में बाधा नहीं डालती, फिर शिखा उड़ाना क्यों लिखा? जैसी तुम्हारी
हरकतें है उसे देखकर तो यही समझ में आता है कि तुम्हारे मन यह भय होगा कि कभी किसी
से विवाद हो गया तो लड़ाई में कोई तुम्हारी या तुम्हारे चैलों की चुटिया पकड़ कर सुत
न दें लेकिन तुमने स्वयं अपनी संस्कार विधि में शिखा सूत्र का धारण करना लिखा है अब
यदि शिखा रखने से बुद्धि कम होती है तो फिर शिखा सूत्र का संस्कार विधि में धारण करना
व्यर्थ ही लिखा है, फिर यज्ञोपवीत भी धारण करना व्यर्थ है तो यह संस्कार उडाकर वेद
पर भी हडताल फेर दी होती, तुम्हें यह ने सूझी की यदि डाढ़ी मूँछ में उच्छिष्ट लग गया
तो क्या वह पानी से नहीं धुल सकती, या तुम इतने बड़े वाले आलसी हो कि भोजन करने के
पश्चात मूहँ भी नहीं धोते, और जब शिखा ही उडा दी, तो जरा अब अपने उस लेख को याद करों
जो तुमने पंच महायज्ञ विधि के पृष्ठ ५ पर यह लिखा है कि “इसके अनंतर गायत्री मंत्र से शिखा को बांध कर
रक्षा करे” अब जब तुमने शिखा ही उडवा दी तो भला शिखा बांधें कैसे? और जब तक शिखा नहीं
बांधते तब तक तुम्हारे कथनानुसार रक्षा कैसे होगी? इसलिए तो कहता हूँ कि स्वामी जी
को अपने लिखें कि ही सुध नहीं कब क्या लिखा और कब क्या? उन्हें स्वयं नहीं पता, स्वामी
जी की यह सत्यानाश प्रकाश परस्पर विरुद्ध बातों से भरी हुई हैं, यह सिर्फ स्वामी जी
का ढ़ोग है, यह आर्यों को भ्रष्ट करने को ढ़ंग चलाया है क्योंकि आर्यों के यह दो ही विशेष
चिन्ह है शिखा और सूत्र सो स्वामी जी ने यही मिटने को यह लोप लीला चलाईं है, इस कारण
दयानंद की यह बात मानने योग्य नहीं, सन्यास आश्रम में प्रविष्ट होने के समय को छोड़
और किसी भी समय शिखा का त्याग नहीं करना चाहिए यही वेदों की अज्ञा है





दिया है


