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दयानन्द कृत वेदभाष्यों की समीक्षा
महर्षि या फिर महाचुतिया! | Mharishi Ya Fir Maha Chutiya
19:14 उपेन्द्र कुमार 'हिन्दू' 0 Comments
इस लेख
के माध्यम से मैं आप लोगों के सामने दयानंद कृत यजुर्वेदभाष्य के कुछ ऐसे भाष्य रख
रहा हूँ जिसे पढ़कर एक बार को आप लोगों की बुद्धि भी चकरा जायेगी आप लोगों को यही समझ
में नहीं आयेगा कि दयानंद के इन भाष्यों पर हंसें, क्रोधित हो या फिर दयानंद की मानसिक
स्थिति को लेकर दुख व्यक्त करें, इस लेख को लिखने का मेरा उद्देश्य सिर्फ इतना है कि
जो लोग दयानंद को संस्कृत का विद्वान समझते हैं, उन्हें यह पता होना चाहिए कि दयानंद
को संस्कृत तो छोडिये संस्कृत का 'स' भी नहीं आता था, या यह कहे कि उन्होंने संस्कृत
की कभी शक्ल तक न देखी होगी तो कहना गलत न होगा, और जब ऐसा मंदबुद्धि व्यक्ति वेदों
का भाष्य करने बैठ जाये तो अर्थ का किस प्रकार अनर्थ करता है, यह बताने की आवश्यकता
नहीं है, वह आपके सामने ही है देखिये--
(दयानंद कृत यजुर्वेदभाष्य, भाष्य-१)
होता यक्षद् अश्विनौ छागस्य हविष
ऽ आत्ताम् अद्य मध्यतो मेद ऽ उद्भृतं पुरा द्वेषोभ्यः पुरा पौरुषेय्या गृभो घस्तां
नूनं घासे ऽ अज्राणां यवसप्रथमानाम्ँ सुमत्क्षराणाम्ँ शतरुद्रियाणाम् अग्निष्वात्तानां
पीवोपवसानां पार्श्वतः श्रोणितः शितामत ऽ उत्सादतो ङ्गाद्-अङ्गाद् अवत्तानां करत एवाश्विना
जुषेताम्ँ हविर् होतर् यज॥ ~यजुर्वेद {२१/४३}
दयानंद
अपने यजुर्वेदभाष्य में इसका अर्थ करते हुए अपने लाडले शिष्यों के लिए फरमाते है कि--
“हे
(होत:) देनेहारे! जैसे, (होता) लेनेवाला,,,, (छागस्य) बकरा आदि पशुओं के, (मध्यत:)-
बीच से, (हविष:)- लेने योग्य पदार्थ, (मेद:)- अर्थात घी, दूध आदि,,,,,, (आत्ताम्) लेवें
वा,,,,, (नूनम्) निश्चय करकें, (घस्ताम्) खावें वा,,,,,, (हवि:) उक्त पदार्थों से खाने
योग्य पदार्थ का,,,,,, (जुषेताम्) सेवन करें”
आर्य समाज एवं नास्तिको को जवाब,
आर्य समाज मत खण्डन,
दयानंद का कच्चा चिट्ठा,
दयानंदभाष्य खंडनम्,
दयानन्द कृत वेदभाष्यों की समीक्षा
स्वामी दयानंद एकादश नियोग की देन | Swami Dayanand Aekadas Niyog KI Dain
19:10 उपेन्द्र कुमार 'हिन्दू' 0 Comments
सनातन
धर्म से भिन्न दयानंद द्वारा चलाए गये वेद विरुद्ध मतों में से एक मत है पशुधर्म नाम
से विख्यात “नियोग प्रथा” दयानंद ने अपने तथाकथित ग्रंथ “सत्यार्थ प्रकाश” में लगभग
पूरा एक समुल्लास इस पशुधर्म नियोग पर ही लिखा है, और वेदादि शास्त्रों के अर्थ का
अनर्थ कर अपने अनुयायियों के साथ साथ समस्त भारतवर्ष को इस महाअधर्म व्यभिचार नियोग नामक अंधकूप में धकेलने
का असफल प्रयास किया है, वेद मनुस्मृति आदि के अर्थ का अनर्थ कर नियोग सिद्ध किया है
जिससे धर्म के न जानने वाले लोगों में भ्रम की स्थिति उत्पन्न होती है, सो इस लेख के
माध्यम से मैं दयानंद के उन मिथ्या भाष्यों की धज्जियां उडाते हुए, प्रमाण के साथ यह
सिद्ध करकें दिखाऊंगा की दयानंद द्वारा चलाया यह पशुधर्म नियोग वेद विरुद्ध होने से मनुष्यों के लिए निषिद्ध है
अर्थात मनुष्यों को यह पशुधर्म त्यागने योग्य है, सो अब एक एक करकें दयानंद के उन सभी
वेद विरुद्ध भाष्यों का खंडन करते हैं जिनके अर्थ का अनर्थ कर दयानंद ने नियोग सिद्ध
किया है सुनिये--
(दयानंद कृत ॠग्वेदभाष्य, भाष्य-१)
सोम: प्रथमो विविदे गन्ध्र्वो विविद उत्तरः।
तृतीयो अग्निष्टे पतिस्तु रीयस्ते मनुष्यजाः॥
~ऋ० {मं० १०, सू० ८५, मं० ४०}
दयानंद
अपने ऋग्वेदभाष्य में इसका अर्थ यह लिखते हैं कि—
“हे स्त्री! जो (ते) तेरा (प्रथमः) पहला विवाहित (पतिः) पति तुझ को (विविदे)
प्राप्त होता है उस का नाम (सोमः) सुकुमारतादि गुणयुक्त होने से सोम जो दूसरा नियोग
होने से (विविदे) प्राप्त होता वह, (गन्धर्व:) एक स्त्री से संभोग करने से गन्धर्व,
जो (तृतीय उत्तरः) दो के पश्चात् तीसरा पति होता है वह (अग्निः)- अत्युष्णतायुक्त होने
से अग्निसंज्ञक और जो (ते) तेरे (तुरीयः) चौथे से लेके ग्यारहवें तक नियोग से पति होते
हैं वे (मनुष्यजाः) मनुष्य नाम से कहाते हैं | जैसा (इमां त्वमिन्द्र) इस मन्त्रा में ग्यारहवें पुरुष तक स्त्री नियोग
कर सकती है, वैसे पुरुष भी ग्यारहवीं स्त्री तक नियोग कर सकता है”
आर्य समाज एवं नास्तिको को जवाब,
आर्य समाज मत खण्डन,
दयानंदभाष्य खंडनम्,
दयानन्द कृत वेदभाष्यों की समीक्षा
नस्लभेदी जातिवादी “दयानंद” | Naslbhedhi Jativadi Dayanand
18:56 उपेन्द्र कुमार 'हिन्दू' 0 Comments॥पैदाइशी चुतिया प्रकरण॥
हमारे
दयानंदी गपोड़िये अक्सर एक बात कहते नहीं थकते कि दयानंद ने समाज में व्याप्त सामाजिक
कुरीतियों पर आक्रमण करते हुए, जातिवाद का विरोध किया, तथा कर्म के आधार पर वेदानुकूल
वर्ण-निर्धारण की बात कही, वे दलितोद्धार के पक्षधर थे, इसी प्रकार के और न जाने क्या
क्या गपोड़े मारते है, सो आज इस लेख के माध्यम से मैं इन सब बातों का खंडन कर, दयानंद
की जिहादी विचारधारा से आप लोगों को अवगत कराना चाहता हूँ, जिससे यह सिद्ध हो जायेगा
कि दयानंद दलितोद्धार के पक्षधर नहीं बल्कि दलितोद्धार के घोर विरोधी थे, समाज में
व्याप्त सामाजिक कुरीतियों नस्लभेद जातिवाद आदि को बढ़ावा देने वाले स्वामी दयानंद
ही थे, जो स्वयं दयानंद के ही द्वारा लिखे वेदभाष्य और लेखों से सिद्ध होता है देखिये--
(दयानंद कृत यजुर्वेदभाष्य, भाष्य-१)
अग्नये पीवानं पृथिव्यै पीठसर्पिणं
वायवे चाण्डालम् अन्तरिक्षाय वम्ँ शनर्तिनं दिवे खलतिम्ँ सूर्याय हर्यक्षं नक्षत्रेभ्यः
किर्मिरं चन्द्रमसे किलासम् अह्ने शुक्लं पिङ्गाक्षम्ँ रात्र्यै कृष्णं पिङ्गाक्षम्॥
~यजुर्वेद { ३०/२१}
दयानंद
अपने यजुर्वेदभाष्य में इसका अर्थ यह लिखते हैं कि---
“हे परमेश्वर वा राजन् !आप, (हर्यक्षम्)- बन्दर की सी छोटी आँखों वाले शीतप्राय देशी मनुष्यों को,,,,,,, (पिङ्गलम्)- पीली आँखोवाले को उत्पन्न कीजिये,,,,,, (चाण्डालम्)- भंगी को, (खलतिम्)- गंजे को,,,,,, (कृष्णम्)- काले रंगवाले, (पिङ्गाक्षम्))- पीले नेत्रों से युक्त पुरूष को दूर कीजिये”
आर्य समाज मत खण्डन,
दयानंद का कच्चा चिट्ठा,
दयानंदभाष्य खंडनम्,
दयानन्द कृत वेदभाष्यों की समीक्षा
दयानंद का कामशास्त्र | Dayanand Ka Kaamshastra
18:43 उपेन्द्र कुमार 'हिन्दू' 0 Comments
जिन
भड़वे समाजियों का उद्देश्य सनातन धर्म ग्रंथों के उदाहरणों को गलत संदर्भ में प्रस्तुत
करते हुए- धर्म के न जानने वालों के बीच भ्रम का भाव उत्पन्न कर उन्हें धर्म के मार्ग
से विमुख करना है सनातनधर्मियों को अपमानित करना व उन्हें नीचा दिखाना, धर्म विरोधीयों
की सहायता करना आदि हैं, उनके लिए सप्रेम --------------
(दयानंद कृत यजुर्वेदभाष्य, भाष्य-१)
पूषणं वनिष्ठुनान्धाहीन्स्थूलगुदया सर्पान्गुदाभिर्विह्लुत आन्त्रैरपो वस्तिना वृषणमाण्डाभ्यां वाजिनग्वगं शेपेन प्रजाग्वं रेतसा चाषान् पित्तेन प्रदरान् पायुना कूश्माञ्छकपिण्डैः॥ ~यजुर्वेद {अध्याय २५, मंत्र ७}
दयानंद
अपने यजुर्वेदभाष्य में इस मंत्र का अर्थ यह लिखते हैं कि---
हे मनुष्यों!
तुम मांगने से पुष्टि करने वालों को स्थूल गुदेंद्रियों के साथ वर्तमान, अंधे सर्पों
को गुदेंद्रियों के साथ वर्तमान विशेष कुटिल सर्पों को आंतों से, जलों को नाभि के नीचे
के भाग से, अंडकोष को आंडों से, घोडे के लिंग और वीर्य से संतान को, पित्त से भोजनों
को, पेट के अंगो को गुदेंद्रिय और शक्तियों से शिखावटों को निरंतर लेओं।
समीक्षक-- अब कोई इन नियोग समाजीयों से यह पूछे कि उन्हें दयानंद द्वारा किये गये
अधिकांश मंत्रो के ऐसे अर्थ अश्लील क्यों नहीं लगते? और जब इस वेद ऋचा की ही भांति
इन्हें अन्य सनातनी धर्म ग्रथों मे कोई श्रुति या श्लोक दिख जाता हैं तो अपनी बुद्धि
अनुसार ही उसके अर्थ का अनर्थ कर आप्त पुरूषों द्वारा रचित ग्रंथों का अपमान करते है
और उल्टा सनातनधर्मियों और उनके शास्त्रकारों को-- धूर्त, निशाचर, पाखंडी, नीच और न
जाने कितनी गालियाँ देते हैं,
आर्य समाज एवं नास्तिको को जवाब,
दयानंद,
दयानंदभाष्य खंडनम्,
सत्यार्थ प्रकाश का कच्चा चिठा
दयानंदी जिहाद
16:49 उपेन्द्र कुमार 'हिन्दू' 3 Commentsदयानंद मत लड़ाई में स्त्रियाँ भी धन संपदा आदि की भाँति लूटने और बाटने की वस्तु।
सत्यार्थ प्रकाश षष्ठ समुल्लास....
स्वामी दयानंद लिखते है -
रथाश्वं हस्तिनं छत्रं धनं धान्यं पशून्स्त्रियः ।
सर्वद्रव्याणि कुप्यं च यो यज्जयति तस्य तत् ॥११॥
स्वामी जी इसका अर्थ लिखते हैं - " इस व्यवस्था को कभी न तोड़े कि जो-जो लड़ाई में जिस-जिस भृत्य वा अध्यक्ष ने रथ घोड़े, हाथी, छत्र, धन-धान्य, गाय आदि पशु और स्त्रियां तथा अन्य प्रकार के सब द्रव्य और घी, तेल आदि के कुप्पे जीते हों वही उस-उस का ग्रहण करे ।।११।।
वाह रे सत्यार्थ प्रकाश लिखने वाले भंगेडानंद वाह ! क्या यही है आपकी बुद्धि, यही है आपका धर्म ??
क्या लूटपाट के उद्देश्य से लडा गया युद्ध , शत्रुओं की धन संपदा और उनकी स्त्रियों का भोग करना धर्मानुकूल और वेद सम्मत है ??
यदि मनुस्मृति आपकी समझ से बाहर थी तो इसके अर्थ का अनर्थ करना जरूरी था जहाँ आशय 'मादा पशु (अर्थात गाय, भैंस आदि)' से था आपने वहाँ पशु अलग और स्त्री को अलग कर, स्त्री को लूटने वाली वस्तु बना दिया।
क्या यही है आपकी बुद्धि ??
क्या आपके अनुसार लूटपाट के उद्देश्य से लडा गया युद्ध, धन संपदा, पशुादि की भाँति स्त्रियों को लूटना धर्मानुकूल है ??
खेर इस प्रकार का निच कर्म तो स्वामी जी आप जैसे मंद बुद्धि, धूर्त को ही शोभा देता है
दयानंद,
दयानंदभाष्य खंडनम्
दयानंद की मक्कारी ( Dayanand Ki Makkari )
18:59 उपेन्द्र कुमार 'हिन्दू' 9 Commentsदयानंद की मक्कारी किसी से छुपी नहीं है दयानंद ने अपना स्वार्थ सिद्ध करने के लिए पवित्र वेदो को भी नहीं छोड़ा अपनी गंदी सोच वेदों में भी डालने का प्रयास किया ।
दयानंद सत्यार्थ प्रकाश चतुर्थ सम्मुलास में लिखते है
इमां त्वमिन्द्र मीढ्वः सुपुत्रां सुभगां कृणु।
दशास्यां पुत्राना धेहि पतिमेकादशं कृधि।(ऋग्वेद 10-85-45)
भावार्थ : ‘‘हे वीर्य सेचन हार ‘शक्तिशाली वर! तू इस विवाहित स्त्री या विधवा स्त्रियों को श्रेष्ठ पुत्र और सौभाग्य युक्त कर। इस विवाहित स्त्री से दस पुत्र उत्पन्न कर और ग्यारहवीं स्त्री को मान। हे स्त्री! तू भी विवाहित पुरुष या नियुक्त पुरुषों से दस संतान उत्पन्न कर और ग्यारहवें पति को समझ।’’
आर्य समाज एवं नास्तिको को जवाब,
दयानंद,
दयानंदभाष्य खंडनम्
असत्यवादी महाधूर्त दयानंद ( Astaywadi Mahadhurt Dayananad )
17:40 उपेन्द्र कुमार 'हिन्दू' 0 Comments
सत्यार्थ प्रकाश प्रथम समुल्लास मंगलचरण न करने का खंडन
___________________________________
(प्रश्न) जैसे अन्य ग्रन्थकार लोग आदि, मध्य और अन्त में मंगलाचरण करते हैं वैसे आपने कुछ भी न लिखा, न किया?
...
___________________________________
(प्रश्न) जैसे अन्य ग्रन्थकार लोग आदि, मध्य और अन्त में मंगलाचरण करते हैं वैसे आपने कुछ भी न लिखा, न किया?
...
(उत्तर) ऐसा हम को करना योग्य नहीं। क्योंकि जो आदि, मध्य और अन्त में मंगल करेगा तो उसके ग्रन्थ में आदि मध्य तथा अन्त के बीच में जो कुछ लेख होगा वह अमंगल ही रहेगा। इसलिए ‘मंगलाचरणं शिष्टाचारात् फलदर्शनाच्छ्रुतितश्चेति ।’ यह सांख्यशास्त्र का वचन है।
इस का यह अभिप्राय है कि जो न्याय, पक्षपातरहित, सत्य, वेदोक्त ईश्वर की आज्ञा है, उसी का यथावत् सर्वत्र और सदा आचरण करना मंगलाचरण कहाता है। ग्रन्थ के आरम्भ से ले के समाप्तिपर्यन्त सत्याचार का करना ही मंगलाचरण है, न कि कहीं मंगल और कहीं अमंगल लिखना।
_______________________________________
इस का यह अभिप्राय है कि जो न्याय, पक्षपातरहित, सत्य, वेदोक्त ईश्वर की आज्ञा है, उसी का यथावत् सर्वत्र और सदा आचरण करना मंगलाचरण कहाता है। ग्रन्थ के आरम्भ से ले के समाप्तिपर्यन्त सत्याचार का करना ही मंगलाचरण है, न कि कहीं मंगल और कहीं अमंगल लिखना।
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दयानंद,
दयानंदभाष्य खंडनम्,
सत्यार्थ प्रकाश का कच्चा चिठा
दयानंद के भंग की तंरग ( Dayanand Ke Bhang Ki Tarang )
12:12 उपेन्द्र कुमार 'हिन्दू' 7 Comments
दयानंद की पोप लीला
दयानंद जैसा धुर्त जो खुद की कही बात से पलट जाए पुरे विश्व में नहीं मिलेगा
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स ब्रह्मा स विष्णुः स रुद्रस्स शिवस्सोऽक्षरस्स परमः स्वराट्।...
स इन्द्रस्स कालाग्निस्स चन्द्रमाः।।७।। -कैवल्य उपनिषत्।
भावर्थ : सब जगत् के बनाने से ‘ब्रह्मा’, सर्वत्र व्यापक होने से ‘विष्णु’, दुष्टों को दण्ड देके रुलाने से ‘रुद्र’, मंगलमय और सब का कल्याणकर्त्ता होने से ‘शिव’,
जो सर्वत्र व्याप्त अविनाशी, स्वयं प्रकाशस्वरूप और प्रलय में सब का काल और काल का भी काल है, इसलिए परमेश्वर का नाम ‘कालाग्नि’ है।।७।।
प्रथम समुल्लास मे ही फिर आगे लिखा है कि-
इसलिए सब मनुष्यों को योग्य है कि परमेश्वर ही की स्तुति, प्रार्थना और उपासना करें, उससे भिन्न की कभी न करें। क्योंकि ब्रह्मा, विष्णु, महादेव नामक पूर्वज महाशय विद्वान्, दैत्य दानवादि निकृष्ट मनुष्य और अन्य साधारण मनुष्यों ने भी परमेश्वर ही में विश्वास करके उसी की स्तुति, प्रार्थना और उपासना करी, उससे भिन्न की नहीं की। वैसे हम सब को करना योग्य है। { सत्यार्थ प्रकाश- प्रथम समुल्लास }
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दयानंद जैसा धुर्त जो खुद की कही बात से पलट जाए पुरे विश्व में नहीं मिलेगा
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स ब्रह्मा स विष्णुः स रुद्रस्स शिवस्सोऽक्षरस्स परमः स्वराट्।...
स इन्द्रस्स कालाग्निस्स चन्द्रमाः।।७।। -कैवल्य उपनिषत्।
भावर्थ : सब जगत् के बनाने से ‘ब्रह्मा’, सर्वत्र व्यापक होने से ‘विष्णु’, दुष्टों को दण्ड देके रुलाने से ‘रुद्र’, मंगलमय और सब का कल्याणकर्त्ता होने से ‘शिव’,
जो सर्वत्र व्याप्त अविनाशी, स्वयं प्रकाशस्वरूप और प्रलय में सब का काल और काल का भी काल है, इसलिए परमेश्वर का नाम ‘कालाग्नि’ है।।७।।
प्रथम समुल्लास मे ही फिर आगे लिखा है कि-
इसलिए सब मनुष्यों को योग्य है कि परमेश्वर ही की स्तुति, प्रार्थना और उपासना करें, उससे भिन्न की कभी न करें। क्योंकि ब्रह्मा, विष्णु, महादेव नामक पूर्वज महाशय विद्वान्, दैत्य दानवादि निकृष्ट मनुष्य और अन्य साधारण मनुष्यों ने भी परमेश्वर ही में विश्वास करके उसी की स्तुति, प्रार्थना और उपासना करी, उससे भिन्न की नहीं की। वैसे हम सब को करना योग्य है। { सत्यार्थ प्रकाश- प्रथम समुल्लास }
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दयानंद,
दयानंदभाष्य खंडनम्,
सत्यार्थ प्रकाश का कच्चा चिठा
दयानंदभाष्य खंडनम्- भूमिका ( Dayanand Bhasya Khandanam Bhumika )
11:57 उपेन्द्र कुमार 'हिन्दू' 0 Comments
भूमिका :
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दयानंद ने अपनी मृत्यु से कुछ महीनों पहले सन् 1882 में इस ग्रन्थ के दूसरे संस्करण में स्वयं यह लिखा-
नियोग्
...
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दयानंद ने अपनी मृत्यु से कुछ महीनों पहले सन् 1882 में इस ग्रन्थ के दूसरे संस्करण में स्वयं यह लिखा-
नियोग्
...
जिस समय मैंने यह ग्रन्थ ‘सत्यार्थप्रकाश’ बनाया था, उस समय और उस से पूर्व संस्कृतभाषण करने, पठन-पाठन में संस्कृत ही बोलने और जन्मभूमि की भाषा गुजराती होने के कारण से मुझ को इस भाषा का विशेष परिज्ञान न था, इससे भाषा अशुद्ध बन गई थी। अब भाषा बोलने और लिखने का अभ्यास हो गया है। इसलिए इस ग्रन्थ को भाषा व्याकरणानुसार शुद्ध करके दूसरी वार छपवाया है। कहीं-कहीं शब्द, वाक्य रचना का भेद हुआ है सो करना उचित था, क्योंकि इसके भेद किए विना भाषा की परिपाटी सुधरनी कठिन थी, परन्तु अर्थ का भेद नहीं किया गया है, प्रत्युत विशेष तो लिखा गया है। हाँ, जो प्रथम छपने में कहीं-कहीं भूल रही थी, वह निकाल शोधकर ठीक-ठीक कर दी गई है।
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आर्य समाज एवं नास्तिको को जवाब,
दयानंद,
दयानंदभाष्य खंडनम्,
सत्यार्थ प्रकाश का कच्चा चिठा
सत्यार्थ प्रकाश के लेखक दयानंद चले डॉक्टर बनने ( Satyarth Prakash Ka Lekhak Bana Doctor )
11:02 उपेन्द्र कुमार 'हिन्दू' 5 Comments
सत्यार्थ प्रकाश के लेखक दयानंद चले डॉक्टर बनने ।
स्वामी जी कहने को तो ब्रह्मचारी थे पर थे बड़े रंगीले टाइप के औरतों से मजें लेने का एक मौका नहीं चूकते
कभी योनिसंकोचन के नाम पर बेचारी मासूम औरतों का चुतिया काटते तो कभी स्तन के छिद्र पर औषधि लेप
कैसे करें घंटा नही बताया
और बताते भी कैसे जब स्वयं ही नहीं जानते थे की क्या अंड संड बके जा रहा है
और गर्भाधान की तो बात ही क्या कहना उसे पढकर तो अंतर्रासवासन लिखने वाले भी डूब मरे ।
खेर ये सब बातें बाद की है पहले प्रश्न पर आते हैं
___________________________________
सत्यार्थ प्रकाश द्वितिय सम्मुलास :
प्रसूता स्त्री बच्चे को दूध न पिलावे। दूध रोकने के लिये स्तन के छिद्र पर उस ओषधी का लेप करे जिससे दूध स्रवित न हो। ऐसे करने से दूसरे महीने में पुनरपि युवती हो जाती है।
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स्वामी जी कहने को तो ब्रह्मचारी थे पर थे बड़े रंगीले टाइप के औरतों से मजें लेने का एक मौका नहीं चूकते
कभी योनिसंकोचन के नाम पर बेचारी मासूम औरतों का चुतिया काटते तो कभी स्तन के छिद्र पर औषधि लेप
कैसे करें घंटा नही बताया
और बताते भी कैसे जब स्वयं ही नहीं जानते थे की क्या अंड संड बके जा रहा है
और गर्भाधान की तो बात ही क्या कहना उसे पढकर तो अंतर्रासवासन लिखने वाले भी डूब मरे ।
खेर ये सब बातें बाद की है पहले प्रश्न पर आते हैं
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सत्यार्थ प्रकाश द्वितिय सम्मुलास :
प्रसूता स्त्री बच्चे को दूध न पिलावे। दूध रोकने के लिये स्तन के छिद्र पर उस ओषधी का लेप करे जिससे दूध स्रवित न हो। ऐसे करने से दूसरे महीने में पुनरपि युवती हो जाती है।
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आर्य समाज एवं नास्तिको को जवाब,
दयानंदभाष्य खंडनम्,
सत्यार्थ प्रकाश का कच्चा चिठा
एक मूर्ख को पूरी दुनिया मूर्ख ही दिखाई पड़ती है ( Maha Dhurt Dayanand )
10:28 उपेन्द्र कुमार 'हिन्दू' 0 Comments
✴✴ दयानंदभाष्य खंडनम् - ४ ✴✴
ये देखिए इस धूर्त को सत्यार्थ प्रकाश के अपने एकादश समुल्लास में ये बोलता है कि नानक जी को ज्ञान नहीं था
अब ज्ञान था या नहीं था मैं इस चक्कर में नहीं पडना चाहता।
परन्तु दुसरो का अपमान करने वाला , दुसरो को मुर्ख समझने वाला स्वयं कितना ज्ञानी है यह जानना जरूरी हो जाता है...
आइए देखते है स्वामी जी कितने समझदार मतलब ज्ञानी थे उन्हीं के शब्दों में पढ़िए
अ) सत्यार्थ प्रकाश के नवम समुल्लास में स्वामी जी कहते हैं कि
आसमान का जो ये नीला रंग है वो आसमान में उपस्थित पानी की वजह से है जो वर्षता है सो वो नीला दिखता है
ये देखिए इस धूर्त को सत्यार्थ प्रकाश के अपने एकादश समुल्लास में ये बोलता है कि नानक जी को ज्ञान नहीं था
अब ज्ञान था या नहीं था मैं इस चक्कर में नहीं पडना चाहता।
परन्तु दुसरो का अपमान करने वाला , दुसरो को मुर्ख समझने वाला स्वयं कितना ज्ञानी है यह जानना जरूरी हो जाता है...
आइए देखते है स्वामी जी कितने समझदार मतलब ज्ञानी थे उन्हीं के शब्दों में पढ़िए
अ) सत्यार्थ प्रकाश के नवम समुल्लास में स्वामी जी कहते हैं कि
आसमान का जो ये नीला रंग है वो आसमान में उपस्थित पानी की वजह से है जो वर्षता है सो वो नीला दिखता है
दयानंद,
दयानंदभाष्य खंडनम्
दयानंद सनातन धर्म का शत्रु ( Dayanand Sanatan Dharm Ka Shatru )
09:20 उपेन्द्र कुमार 'हिन्दू' 0 Comments
✴✴ दयानंदभाष्य खंडनम् -३ ✴✴
दयानंद ने वेदआदि भाष्यों के साथ छेडछाड क्यों किया
इन सबके पिछे स्वामी जी का उद्देश्य क्या था ??
आइए देखते है
इन सबके पिछे स्वामी जी का उद्देश्य क्या था ??
आइए देखते है
सत्यार्थ प्रकाश सप्तम संमुल्लास :- दयानन्द जी लिखते है ।
अग्नेर्वा ऋग्वेदो जायते वायोर्यजुर्वेद: सुर्यात्सामवेद: ।।
स्वामी जी इसका अर्थ लिखते है -
"ईश्वर ने सृष्टि की आदि मे अग्नि वायु आदित्य तथा अंगिरा ऋषियो की आत्माओ मे एक एक वेद का प्रकाशन किया"
जब काशी शास्त्रार्थ में काशी के मूर्धन्य पंडितों के अग्रणी “स्वामी श्री विशुद्धानन्द जी महाराज” ने दुराग्रही स्वामी दयानन्द को शास्त्रार्थ में धूल चटाई :—->
स्वामी दयानंद ने अपना तार्किक उल्लू सीधा करने के लिए एक बार काशी में शास्त्रार्थ कर के सनातन धर्म को समाप्त करके सनातन धर्म के स्थान पर आर्य समाज की स्थापना कैअने के लिए काशी प्रयाण किया । काशी के दिग्गज पंडितों के समाख स्वामी दयानंद का काशी शास्त्रार्थ काशी नरेश महाराज ईश्वरीनारायण सिंह की मध्यस्थता में शास्त्रार्थ प्रारम्भ हुआ। इस शास्त्रार्थ के दर्श के तौर पर काशी नरेश के भाई राजकुमार वीरेश्वर नारायण सिंह, तेजसिंह वर्मा आदि प्रतिष्ठित व्यक्ति भी उपस्थित थे । इस शास्त्रार्थ में क्या हुआ देखें -
स्वामी जी अपनी पुस्तक सत्यार्थ प्रकाश के द्वितीय संमुल्लास मे लिखते है
प्रसूता स्त्री अपने स्तन के छिद्र पर औषधि का लेप करे ...
जिससे दूध श्रावित ना हो ।।
प्रसूता स्त्री अपने स्तन के छिद्र पर औषधि का लेप करे ...
जिससे दूध श्रावित ना हो ।।
कमाल की बात है स्वामी जी ने इस औसधि के कही भी वर्णन नही किया की कौन सि औसधि है जिसका लेप करने से दूध श्रावित ना होगा ??
और मैंने सुना है की
प्रसूता स्त्री के स्तन मे यदि दूध श्रावित ना हो या मात्रा अधिक हो जाती है
तो काफी पीड़ा का सामना करना पड़ता है स्त्री को
फिर आज के डॉक्टर्स भी यही सलाह देते है पीड़ा दूध के अत्यधिक दबाव की वजह से है ।।
तो ऐसे मे दूध श्रावित ना होने देने से क्या तातपर्य है ??
स्वामी जी ओवर स्मार्ट बनने के चक्कर में ये भी भूल गए की वो एक ब्रह्मचारी है और एक ब्रह्मचारी को स्त्री चर्चा शोभा नहीं देता !
ऐसे धूर्तो से तो भगवन ही बचाये
और मैंने सुना है की
प्रसूता स्त्री के स्तन मे यदि दूध श्रावित ना हो या मात्रा अधिक हो जाती है
तो काफी पीड़ा का सामना करना पड़ता है स्त्री को
फिर आज के डॉक्टर्स भी यही सलाह देते है पीड़ा दूध के अत्यधिक दबाव की वजह से है ।।
तो ऐसे मे दूध श्रावित ना होने देने से क्या तातपर्य है ??
स्वामी जी ओवर स्मार्ट बनने के चक्कर में ये भी भूल गए की वो एक ब्रह्मचारी है और एक ब्रह्मचारी को स्त्री चर्चा शोभा नहीं देता !
ऐसे धूर्तो से तो भगवन ही बचाये
स्वामी जी कितने महान थे....
जहाँ जिस मंत्र में नियोग की गन्ध तक नहीं होती थी पहले तो वहाँ नियोग स्वयं गढ़ते थे फिर उसमें ११, ११ वाला तडका दे मारते थे। इसके बाद ही उसे मुर्ख समाजीयो के सामने परोसते थे आइए स्वामी जी की धूर्तता का एक नमूना दिखाता हूँ आपको ...
सत्यार्थ प्रकाश चतुर्थ संमुल्लास:
प्रोषितो धर्मकार्याथ प्रतिक्षयोष्टौ नरः समाः ।।
विद्यार्थ षड्यशसोर्थ वा कामार्थत्रीस्तुवत्सरान् ।। ( मनुस्मृति - 9/ 75 )








