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चुतियार्थ प्रकाश,
दयानंद का कच्चा चिट्ठा,
सत्यानाश प्रकाश
थियोसोफिकल सोसायटी आफॅ द आर्य समाज | Theosophical Society of the Arya Samaj
21:02 उपेन्द्र कुमार 'हिन्दू' 0 Comments
इतिहास साक्षी है कि जब-जब इस भारतवर्ष की अखंडता और इसकी
सनातन संस्कृति को शत्रुओं ने नष्ट करने का प्रयास किया है और सफल हुए तो उसके पीछे
हमारे अपने जयचंद जैसे गद्दारों की बहुत बड़ी भूमिका रही है ऐसे ही एक व्यक्ति थे स्वामी
दयानंद जिनका उद्देश्य था किसी भी प्रकार से सनातन धर्म को तोड़ एक नये धर्म की स्थापना
करना, परन्तु यह कार्य इतना सरल न था, क्योकि उस समय तक न तो स्वामी जी को कोई जानता
ही था और न ही स्वामी जी के पास इतनी क्षमता थी कि वह अपने इस स्वप्न को पूरा कर सकें,
इसका सबसे बड़ा कारण यह था कि स्वामी जी द्वारा चलाया नवीन मत सभी प्राचीन मतों से
भिन्न था, जिसमें स्वामी जी ने ईसाइयों की भांति सनातन कर्मकांडों का निषेध व्रत, पूजापाठ,
अवतारादि का विरोध और इसके अतिरिक्त ईसाइयों की भांति स्वामी जी ने एक वेश्याधर्म चलाया
जिसमें एक स्त्री पुरुष के ग्यारह पुरूष स्त्रीयों तक नियोग करने जैसा निंदित कर्म
शामिल था, स्वामी जी का यह मत भारतवर्ष में व्याप्त सभी मतों से पूर्णतः भिन्न था सिवाय
ईसाई मत के, यह दोनों ही मत भारत में नवीन थे, और दोनों ही मत भारत में अपने पैर पसारने
के लिए एक सुनहरे अवसर की प्रतीक्षा में थे, अब क्योकि उस समय भारतवर्ष पर ईसाइयों
शासकों अर्थात अंग्रेजों का राज था, और क्योंकि दयानंद के अंग्रेजों के साथ अच्छे सम्बन्ध
थे (जो थियोसोफिस्ट पत्र में छपे कुछ लेखों से सिद्ध होता है इसकी चर्चा हम आगे करेंगे)
सो स्वामी जी ने अपने मत प्रचार हेतु ईसाई मिशनरीयों की सहायता लेने का निश्चय किया,
चुतियार्थ प्रकाश,
दयानंद का कच्चा चिट्ठा,
सत्यानाश प्रकाश
दयानंद, सत्यार्थ प्रकाश और उनके वेदभाष्यों कि वास्तविकता
23:39 उपेन्द्र कुमार 'हिन्दू' 0 Comments
पूर्व काल मे भारतवर्ष विद्या बुद्धि
और सर्वगुणों की खान था, जिस समय इस भारत वर्ष की कीर्तिपताका भूमंडल के चारो तरफ
फहरा रही थी उस समय कनो से सुनी कीर्तियो और नेत्रो से देखने निमित दूर देशो से
लोग यहाँ आते थे और अपने नेत्रो को सुफलकर यहाँ की अतुलनीय कीर्ति को अपनी भाषा के
ग्रंथो मे रचते थे, वे ग्रंथ आज भी इस देश की गुरुता और कीर्ति का स्मरण कराते है
जिस समय यह विश्व अज्ञानान्धकार मे मग्न था पृथ्वी के अधिकांश भाग असभ्यता पूर्ण
ही रही थी उस समय यही देश धर्म आस्तिकता और भक्ति और सभ्यता के पूर्ण प्रकाश से
जगमगा रहा था, परंतु समय की भी क्या अलौकिक महिमा है की सूर्यमंडल को आकाश मे चढ़कर
मध्यान्ह समय महातीक्ष्ण होकर फिर से नीचे उतरना पड़ता है ठीक वही दशा इस देश की
हुई, जो सबका सिर मौर था वो पराधीनता के भार से महापीङित हो रहा है, भारत के
उपरांत यह देश विदेशी चढ़ाइयों से गारत होकर ऐसा आहत हुआ है, की निस्सार बलहीन होकर
आलस्य का भंडार हो गया है, इसकी विद्या बुद्धि सब विदेशी शिक्षा मे लय हो गयी है,
धर्म कर्म मे असावधानी हो गयी है, संस्कृत विद्या जो द्विजमात्र का आधार थी, उसके
शब्द भी अब शुद्ध नही उच्चारण होते, इस प्रकार धर्म विलुप्त होने से अनेक मतभेद भी
हो गए है, जिस पुरुष को कुछ भी सहायता मिली झट उसने अपना नवीन पंथ की कलपना कर
शब्द ब्रह्म की कल्पना कर ली, और शिष्यों को उपदेश देना आरंभ कर दिया, इसका फल इस
देश मे यह हुआ की फूट का वृक्ष उतपन्न हो गया और सत् धर्म में बाधा पड़ने लगी, इन
नवीन मतो से हानि तो हो ही रही थी, इसी समय दयानन्द सरस्वती ने अपना मत चलाकर कोप
लीला प्रारम्भ की, इसमे भक्ति भाव, मूर्तिपूजा, अवतार, श्राद्ध, पाप दूर होना,
तीर्थ, माहात्म्य आदि का निषेध करके जप तप, आचार विचार, जाति को मेटकर, कर्म से
ब्राह्मणादि वर्ण, नियोग-प्रचार, स्त्री के एकादश ( ग्यारह ) पति आदि करने की विधि
आदि की आज्ञा देकर वेद मे रेल, तार, कमेटी आदि का वर्णन कर सब कुछ वेदों के
नाम से ही लिख दिया है,
चुतियार्थ प्रकाश,
दयानंद का कच्चा चिट्ठा,
सत्यानाश प्रकाश
दयानंद आत्मचरित- एक अधूरा सच (Dayanand Atamcharit)
22:37 उपेन्द्र कुमार 'हिन्दू' 0 Comments
स्वामी
दयानंद जीवन चरित्र | Swami Dayanand Jivan Chaitra
स्वामी दयानंद एक साधारण मनुष्य थे, और उनके अंदर भी साधारण
मनुष्यों की ही भाँति सभी गुण व दोष मौजूद थे, इसीलिए जब उन्होंने अपना आत्मचरित दुनिया
के सामने रखा तो निश्चित ही एक साधारण मनुष्य की भाँति सिर्फ उनकी अच्छी बाते ही दुनिया
तक पहुंचे ऐसी कोशिश की होगी, और यही किया भी, क्योकि जब हम इतिहास पर दृष्टि डालते
है और उनका जीवन चरित्र पढ़ते है तो हमे केवल वही दिखता है जो वो हमें दिखाना चाहते
होंगे, कौन जाने सच क्या होगा?
क्योकि उनके जीवन चरित्र में काफी बातें ऐसी हैं जो आधे
अधूरे सच की तरफ इशारा करती है, जिनकी प्रमाणिकता इतिहास के अंधेरों में सदा सदा के
लिए खो गयी है, जैसे--
चुतियार्थ प्रकाश,
सत्यानाश प्रकाश
सत्यानाश प्रकाश- भूमिका (Satyanash Prakash Bhumika)
21:14 उपेन्द्र कुमार 'हिन्दू' 0 Commentsॐ इत्येतदक्षरमिदं सर्वं तस्योपव्याख्यानं भूतं भवद्भविष्यदिति सर्वमोंकार एव।
यच्चान्यत्त्रिकालातीतं तदप्योंकार एव॥
भूमिका
पूर्व काल मे भारतवर्ष विद्या बुद्धि और सर्वगुणों की खान था, जिस समय इस भारत वर्ष की कीर्तिपताका भूमंडल के चारो तरफ फहरा रही थी, उस समय कनो से सुनी कीर्तियो और नेत्रो से देखने निमित दूर देशो से लोग यहाँ आते थे, और अपने नेत्रो को सुफलकर यहाँ की अतुलनीय कीर्ति को अपनी भाषा के ग्रंथो मे रचते थे, वे ग्रंथ आज भी इस देश की गुरुता और कीर्ति का स्मरण कराते है, जिस समय यह विश्व अज्ञानान्धकार मे मग्न था पृथ्वी के अधिकांश भाग असभ्यता पूर्ण ही रही थी उस समय यही देश धर्म आस्तिकता और भक्ति और सभ्यता के पूर्ण प्रकाश से जगमगा रहा था, उस समय इस देश मे ही ज्ञान विज्ञान गणित दर्शन ज्योतिष काव्य पुराण साहित्य धर्मादि विषयो मे पूर्ण उन्नति की थी,
महर्षि अगस्त्य का विद्युत्-शास्त्र | Electricity Formula by Maharishi Agastya
महर्षि अगस्त्य एक वैदिक ॠषि थे। इन्हें सप्तर्षियों में से एक माना जाता है। ये वशिष्ठ मुनि (राजा दशरथ के राजकुल गुरु) के बड़े भाई थे। वेदों से लेकर पुराणों में इनकी महानता की अनेक बार चर्चा की गई है | इन्होने अगस्त्य संहिता नामक ग्रन्थ की रचना की जिसमे इन्होने हर प्रकार का ज्ञान समाहित किया |
वैज्ञानिक ऋषियों के क्रम में महर्षि अगस्त्य भी एक वैदिक ऋषि थे। निश्चित ही आधुनिक युग में बिजली का आविष्कार माइकल फैराडे ने किया था। बल्ब के अविष्कारक थॉमस एडिसन अपनी एक किताब में लिखते हैं कि एक रात मैं संस्कृत का एक वाक्य पढ़ते-पढ़ते सो गया। उस रात मुझे स्वप्न में संस्कृत के उस वचन का अर्थ और रहस्य समझ में आया जिससे मुझे बल्ब बनाने में मदद मिली।
भास्कराचार्य (1114 – 1185) प्राचीन भारत के एक प्रसिद्ध गणितज्ञ एवं ज्योतिषी थे। इनके द्वारा रचित मुख्य ग्रन्थ सिद्धान्त शिरोमणि है जिसमें लीलावती, बीजगणित, ग्रहगणित तथा गोलाध्याय नामक चार भाग हैं। ये चार भाग क्रमशः अंकगणित, बीजगणित, ग्रहों की गति से सम्बन्धित गणित तथा गोले से सम्बन्धित हैं। आधुनिक युग में धरती की गुरुत्वाकर्षण शक्ति (पदार्थों को अपनी ओर खींचने की शक्ति) की खोज का श्रेय न्यूटन को दिया जाता है। किंतु बहुत कम लोग जानते हैं कि गुरुत्वाकर्षण का रहस्य न्यूटन से भी कई सदियों पहले भास्कराचार्य ने उजागर कर दिया था। भास्कराचार्य ने अपने ‘सिद्धांतशिरोमणि’ ग्रंथ में पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण के बारे में लिखा है कि ‘पृथ्वी आकाशीय पदार्थों को विशिष्ट शक्ति से अपनी ओर खींचती है। इस कारण आकाशीय पिण्ड पृथ्वी पर गिरते हैं’। उन्होने करणकौतूहल नामक एक दूसरे ग्रन्थ की भी रचना की थी। ये अपने समय के सुप्रसिद्ध गणितज्ञ थे। कथित रूप से यह उज्जैन की वेधशाला के अध्यक्ष भी थे। उन्हें मध्यकालीन भारत का सर्वश्रेष्ठ गणितज्ञ माना जाता है।
आयु सम्बन्धी प्रत्येक जानने योग्य ज्ञान (वेद) को आयुर्वेद कहते है, आयुर्वेद सम्बन्धी सिद्धान्तों का क्रमबद्ध संकलन कर ऋषियों ने अनेक संहिताओ का निर्माण किया है, इस संहिताओ में सुश्रुत संहिता, शल्य तंत्र प्रधान और चरक संहिता काय चिकित्सा प्रधान ग्रन्थ है, इन ग्रंथो के रचयिता क्रमशः महर्षि सुश्रुत और चरक है।










