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15:08 उपेन्द्र कुमार 'हिन्दू' 0 Commentsवेद क्या हैं? - संशिप्त परिचय
वेद मानव सभ्यता के लगभग सबसे पुराने लिखित दस्तावेज हैं! वेद ही हिन्दू धर्म के सर्वोच्च और सर्वोपरि धर्मग्रन्थ हैं! सामान्य भाषा में वेद का अर्थ है "ज्ञान" ! वस्तुत: ज्ञान वह प्रकाश है जो मनुष्य-मन के अज्ञान-रूपी अन्धकार को नष्ट कर देता है ! वेदों को इतिहास का ऐसा स्रोत कहा गया है जो पोराणिक ज्ञान-विज्ञानं का अथाह भंडार है ! वेद शब्द संस्कृत के विद शब्द से निर्मित है अर्थात इस एक मात्र शब्द में ही सभी प्रकार का ज्ञान समाहित है ! प्राचीन भारतीय ऋषि जिन्हें मंत्रद्रिष्ट कहा गया है, उन्हें मंत्रो के गूढ़ रहस्यों को ज्ञान कर, समझ कर, मनन कर उनकी अनुभूति कर उस ज्ञान को जिन ग्रंथो में संकलित कर संसार के समक्ष प्रस्तुत किया वो प्राचीन ग्रन्थ "वेद" कहलाये ! एक ऐसी भी मान्यता है कि इनके मन्त्रों को परमेश्वर ने प्राचीन ऋषियों को अप्रत्यक्ष रूप से सुनाया था! इसलिए वेदों को श्रुति भी कहा जाता है ।
इस जगत, इस जीवन एवं परमपिता परमेशवर; इन सभी का वास्तविक ज्ञान "वेद" है!
वेद क्या हैं?
वेद भारतीय संस्कृति के वे ग्रन्थ हैं, जिनमे ज्योतिष, गणित, विज्ञानं, धर्म, ओषधि, प्रकृति, खगोल शास्त्र आदि लगभग सभी विषयों से सम्बंधित ज्ञान का भंडार भरा पड़ा है ! वेद हमारी भारतीय संस्कृति की रीढ़ हैं ! इनमे अनिष्ट से सम्बंधित उपाय तथा जो इच्छा हो उसके अनुसार उसे प्राप्त करने के उपाय संग्रहीत हैं ! लेकिन जिस प्रकार किसी भी कार्य में महनत लगती है, उसी प्रकार इन रत्न रूपी वेदों का श्रमपूर्वक अध्यन करके ही इनमे संकलित ज्ञान को मनुष्य प्राप्त कर सकता है !
वेद मंत्रो का संकलन और वेदों की संख्या
ऐसी मान्यता है की वेद प्रारंभ में एक ही था और उसे पढने के लिए सुविधानुसार चार भागो में विभग्त कर दिया गया ! ऐसा श्रीमदभागवत में उल्लेखित एक श्लोक द्वारा ही स्पष्ट होता है ! इन वेदों में हजारों मन्त्र और रचनाएँ हैं जो एक ही समय में संभवत: नहीं रची गयी होंगी और न ही एक ऋषि द्वारा ! इनकी रचना समय-समय पर ऋषियों द्वारा होती रही और वे एकत्रित होते गए !
शतपथ ब्राह्मण के श्लोक के अनुसार अग्नि, वायु और सूर्य ने तपस्या की और ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद को प्राप्त किया !
प्रथम तीन वेदों को अग्नि, वायु और सूर्य से जोड़ा गया है ! इन तीनो नामों के ऋषियों से इनका सम्बन्ध बताया गया है, क्योंकि इसका कारण यह है की अग्नि उस अंधकार को समाप्त करती है जो अज्ञान का अँधेरा है ! इस कारण यह ज्ञान का प्रतीक मन गया है ! वायु प्राय: चलायमान है ! उसका कम चलना (बहना) है ! इसका तात्पर्य है की कर्म अथवा कार्य करते रहना ! इसलिए यह कर्म से सम्बंधित है ! सूर्य सबसे तेजयुक्त है जिसे सभी प्रणाम करते हैं ! नतमस्तक होकर उसे पूजते हैं ! इसलिए कहा गया है की वह पूजनीय अर्थात उपासना के योग्य है ! एक ग्रन्थ के अनुसार ब्रम्हाजी के चार मुखो से चारो वेदों की उत्पत्ति हुई !
☛ ऋग्वेद (Rigveda Samhita)
ऋग्वेद सबसे पहला वेद है। इसमें धरती की भौगोलिक स्थिति, देवताओं के आवाहन के मंत्र हैं। इस वेद में १०२८ सुक्त जिनमें कुल १०,६०० ऋचाएँ है तथा १० मंडल (अध्याय) हैं। ऋग्वेद की ऋचाओं में देवताओं की प्रार्थना, स्तुतियाँ और देवलोक में उनकी स्थिति का वर्णन है।☛ यजुर्वेद (Yajurved Samhita)
यजुर्वेद में यज्ञ की विधियाँ और यज्ञों में प्रयोग किए जाने वाले मंत्र हैं। यज्ञ के अलावा तत्वज्ञान का वर्णन है। इस वेद की दो शाखाएँ हैं शुक्ल और कृष्ण। ४० अध्यायों में १९७५ मंत्र हैं।☛ सामवेद (Samved Samhita)
साम अर्थात रूपांतरण और संगीत। सौम्यता और उपासना। इस वेद में ऋग्वेद की ऋचाओं (मंत्रों) का संगीतमय रूप है। इसमें मूलत: संगीत की उपासना है। इसमें १८७५ मंत्र हैं
इस वेद में रहस्यमय विद्याओं के मंत्र हैं, जैसे जादू, चमत्कार, आयुर्वेद आदि। यह वेद सबसे बड़ा है, इसमें २० अध्यायों में ५६८७ मंत्र हैं।
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15:07 उपेन्द्र कुमार 'हिन्दू' 0 Commentsवेद
☛ ऋग्वेद (Rigveda Samhita)
ऋग्वेद सबसे पहला वेद है। इसमें धरती की भौगोलिक स्थिति, देवताओं के आवाहन के मंत्र हैं। इस वेद में १०२८ सुक्त है जिनमें कुल १०,६०० ऋचाएँ और १० मंडल हैं ऋग्वेद की ऋचाओं में देवताओं की प्रार्थना, स्तुतियाँ और देवलोक में उनकी स्थिति का वर्णन है।☛ यजुर्वेद (Yajurved Samhita)
यजुर्वेद में यज्ञ की विधियाँ और यज्ञों में प्रयोग किए जाने वाले मंत्र हैं। यज्ञ के अलावा तत्वज्ञान का वर्णन है। इस वेद की दो शाखाएँ हैं शुक्ल और कृष्ण। 40 अध्यायों में 1975 मंत्र हैं।☛ सामवेद (Samved Samhita)
साम अर्थात रूपांतरण और संगीत। सौम्यता और उपासना। इस वेद में ऋग्वेद की ऋचाओं (मंत्रों) का संगीतमय रूप है। इसमें मूलत: संगीत की उपासना है। इसमें 1875 मंत्र हैं
इस वेद में रहस्यमय विद्याओं के मंत्र हैं, जैसे जादू, चमत्कार, आयुर्वेद आदि। यह वेद सबसे बड़ा है, इसमें 20 अध्यायों में 5687 मंत्र हैं।
अथर्ववेद भाग- १
अथर्ववेद भाग- २

आर्य समाज खंडन पुस्तकें

☛ दयानंद तिमिर भास्कर
☛ दयानंद के मूल सिद्धांत
☛ दयानंद के यजुर्वेद भाष्य का खंडन
☛ दयानंद की बुद्धि
☛ दयानंद मत दर्पण
☛ दयानंद विद्धता
☛ दयानंद का कच्चा चिट्ठा
☛ दयानंद लीला
आर्य समाज एवं नास्तिको को जवाब
आर्य का मतलब होता है श्रेष्ठ
19:43 उपेन्द्र कुमार 'हिन्दू' 0 Comments
कुछ लोग खुद को इसलिए आर्य कहते है क्योंकि इस देश का नाम कभी आर्यव्रत होता था
रामायण महाभारत मे भी आर्य का सम्बोधन आया है ।।
मगर क्या ये संबोधन क्या किसी भी व्यक्ति विशेष के लिए था ??
या उस वक़्त के लोग खुद को आर्य ( श्रेष्ठ ) कहते थे ??
जवाब है नही बिल्कुल नही
उस वक़्त भी दुसरो के द्वारा भी “आर्यपुत्र” “आर्यमाता” “आर्यपत्नी” का संबोधन मिलता है
एक भी ऐसा उदाहरण नही है जिसमे किसी ने खुद को आर्य कहा हो ।।
कहते भी तो कैसे ??
उस वक़्त के लोग इतने मूर्ख नही थे ।।
आज के कुछ आर्य समाजी अपने नाम के साथ “आर्य” जोड़कर चलते है
मतलव खुद को श्रेष्ठ बताते है ।।
एक ने कल कहा भी “हा मैं आर्य हु क्या आप नही हो ??
मैंने कहा जी मैं आर्य नही हु ।
रामायण महाभारत मे भी आर्य का सम्बोधन आया है ।।
मगर क्या ये संबोधन क्या किसी भी व्यक्ति विशेष के लिए था ??
या उस वक़्त के लोग खुद को आर्य ( श्रेष्ठ ) कहते थे ??
जवाब है नही बिल्कुल नही
उस वक़्त भी दुसरो के द्वारा भी “आर्यपुत्र” “आर्यमाता” “आर्यपत्नी” का संबोधन मिलता है
एक भी ऐसा उदाहरण नही है जिसमे किसी ने खुद को आर्य कहा हो ।।
कहते भी तो कैसे ??
उस वक़्त के लोग इतने मूर्ख नही थे ।।
आज के कुछ आर्य समाजी अपने नाम के साथ “आर्य” जोड़कर चलते है
मतलव खुद को श्रेष्ठ बताते है ।।
एक ने कल कहा भी “हा मैं आर्य हु क्या आप नही हो ??
मैंने कहा जी मैं आर्य नही हु ।
आर्य समाज एवं नास्तिको को जवाब
क्या चाणक्य मूर्तिपूजा विरोधी थे ? ( Arya Samaj Mat Khandan )
19:39 उपेन्द्र कुमार 'हिन्दू' 0 Commentsआर्य समाजी इस पोस्ट का खंडन करके दिखाए !
आर्य समाजी हमेशा यह तर्क देते है कि महान आचार्य_चाणक्य मूर्तिपूजा विरोधी थे,लेकिन अपने पंथ को चलाए रखने के लिए ये इसी तरह के कई कुतर्क करते रहते है जो बिल्कुल निराधार साबित होते आए है-
प्रश्न- चाणक्य मूर्तिपूजा विरोधी थे ?
समीक्षा- चाणक्य मूर्तिपूजा विरोधी नही थे,क्योंकि उनकी अमर कृति चाणक्य_नीति में कई श्लोक ऐसे है जो आर्य समाजियो के इस कुतर्क को निराधार साबित करते है-
“काष्ठपाषाणधातूनां कृत्वा भावेन सेवनम् !
श्रद्धया च तया सिद्धस्तस्य विष्णु: प्रसीदति !!”
चा.नी.-८/११
भावार्थ- लकड़ी,पत्थर अथवा धातु की मूर्ति में प्रभु की भावना और श्रद्धा उसकी पूजा की जाएगी तो सिद्धी अवश्य प्राप्त होती है ! प्रभु इस भक्त पर अवश्य प्रसन्न होतें है !
यदि चाणक्य ये श्लोक अपनी पुस्तक चाणक्य नीति में लिख सकते है तो इससे साफ हो जाता है कि मूर्तिपूजा से कोई हानि नही अथवा लाभ है ! लेकिन पुराण के अनुसार चाणक्य भी ये ही कहते है कि मूर्ति में भगवान नही बल्कि ध्यान केंद्रित करने का एक रास्ता है !इसी को समझाते हुए चाणक्य अपने अगले श्लोक में बोलते है-
दयानंद,
दयानंदभाष्य खंडनम्
दयानंद की मक्कारी ( Dayanand Ki Makkari )
18:59 उपेन्द्र कुमार 'हिन्दू' 9 Commentsदयानंद की मक्कारी किसी से छुपी नहीं है दयानंद ने अपना स्वार्थ सिद्ध करने के लिए पवित्र वेदो को भी नहीं छोड़ा अपनी गंदी सोच वेदों में भी डालने का प्रयास किया ।
दयानंद सत्यार्थ प्रकाश चतुर्थ सम्मुलास में लिखते है
इमां त्वमिन्द्र मीढ्वः सुपुत्रां सुभगां कृणु।
दशास्यां पुत्राना धेहि पतिमेकादशं कृधि।(ऋग्वेद 10-85-45)
भावार्थ : ‘‘हे वीर्य सेचन हार ‘शक्तिशाली वर! तू इस विवाहित स्त्री या विधवा स्त्रियों को श्रेष्ठ पुत्र और सौभाग्य युक्त कर। इस विवाहित स्त्री से दस पुत्र उत्पन्न कर और ग्यारहवीं स्त्री को मान। हे स्त्री! तू भी विवाहित पुरुष या नियुक्त पुरुषों से दस संतान उत्पन्न कर और ग्यारहवें पति को समझ।’’
आर्य समाज एवं नास्तिको को जवाब
आर्य समाज का वैदिक ढोंग ( Arya Samaj Ka Vedic Dhong )
17:58 उपेन्द्र कुमार 'हिन्दू' 3 Commentsआज आर्य समाज ये कहते हुए नही थकता की हम वैदिक है ।
हमारा आचरण वैदिक है
आइये एक नजर डालते है
इनके वैदिक कारनामो पर ।
हम सब जानते है की आर्य मंदिर मे प्रेमी जोड़े की शादिया आर्य समाज करवाता है ।
बहुत अच्छी बात है ये सम्मान के काबिल है उनका ये कदम ।
बहुत सी शादिया आर्य समाजियों ने हिन्दू - मुस्लिम की भी करवाई है
और उनको आर्य समाज से जोड़ा है ।
बहुत अच्छा कर्म है ये आज की दृष्टिकोण से ।।
ऐसा करने से आर्य समाजियों को अपने फोल्लोवर्स बढ़ाने मे काफी मदद मिलती है
क्योंकि जब उन प्रेमी जोड़े की कोई नही सुनता तब उनकी आर्य समाज सुनता है
ऐसे मे प्रेमी जोड़े तन मन धन से आर्य समाज से अटूट श्रद्धा और विस्वास कर लेते है ।।
मगर क्या उनका ये तरीका वैदिक है ??
मेरे मन मे ये ख्याल आया तब जब उन्होंने 2-3बार विवाह की फोटो अपलोड की और कहा की आर्य समाज ने वैदिक तरीके से शादी करवाई ।
मेरा मन व्याकुल हो गया की प्रश्न उठा की क्या ऐसी शादिया वेद सम्मत है ??
अगर नही तो फिर वैदिक तरीके से विवाह करवाने का क्या औचित्य ??
जी हा ऐसे विवाह वेद सम्मत नही है ।।
जब लड़का लड़की स्वयं एक दूसरे को पसंद करके विवाह बंधन मे बंध जाते है तो ऐसे विवाह को गांधर्व विवाह बताया गया है
जिसका वर्णन कुछ इस प्रकार है
इच्छयाSन्योसंयोग:कन्यायाश्चवरस्य च ।
गान्धर्व: स तु विज्ञेयो मैथुन्य: कमसम्भव: ।।
अर्थात - कन्या और वर का अपनी इच्छा से एक दूसरे को पसंद करके विवाह- बंधन मे बंध जाना 'गांधर्व विवाह' कहलाता है । इस प्रकार का विवाह कामजन्य वासना की तृप्ति पर आधृत होता है ।
हत्वा छित्वा च भित्वा क्रोशंतीं रुदंतीं गृहात् ।
प्रसह्य कन्याहरणं राक्षसो विधिरुच्यते ।।
अर्थात- कन्या के अभिभावक का वध करके अथवा उसके हाथ पाव आदि पर चोट मार करके अथवा उनके मकान को तोड़ फोड़ करके रोती हुई कन्या को बलपूर्वक छीनकर अपने अधिकार मे करना "राक्षस विवाह"कहलाता है ।
इतरेशु तु शिष्टेषु नृशन्सानृतवादिन: ।
जायन्ते दुर्विवाहेषु ब्रह्मधर्मद्विष: सुता: ।।
असुर और गांधर्व विवाह से उतपन्न होने वाले पुत्र क्रूर , मिथ्याभाषी , ब्राह्मणों के विरोधी , तथा धर्म से द्वेष करने वाले निर्लज्ज प्रकृति के होते है ।
तो अब मेरा सवाल ये है की क्या आर्य समाज द्वारा करावाया गया ये विवाह धर्म सम्मत है ??
नही क्योंकि गन्धर्व और असुर विवाह क्षत्रियो के धर्म सम्मत बताये गए है उसपे भी आगे पाबंदी है
लिखा हुआ है ।
अनीन्दितै: स्त्रीविवाहैरनिन्ध्या भवति प्रजा ।
निन्दितैर्निन्दिता: नृणां तस्मान्निन्द्यान्विर्वजयेत् ।।
आनंदित ( श्रेष्ठ ) विवाह ( ब्रह्म , देव , आर्ष , प्रजापत्य ) से उत्पन्न होने वाली संतान श्रेष्ठ होती है और इसके विपरीत निकृष्ट एवं निन्दित विवाह से उतपन्न होने वाली संतान निकृष्ट और ओछी होती है ।
अत: श्रेष्ठ संतान के इछुक लोगो को निकृष्ट प्रकर्ति के विवाहो का त्याग करना चाहिए ।।
अब बताये क्या आर्य समाज वैदिक विवाह करवाता है ???
जब वो हिन्दू मुस्लिम की शादी करवाता है तब कहा जाते है इनके वेद ??
दुनिया जानती है इस्लाम राक्षस प्रवर्ति का धर्म है ।
फिर एक राक्षस जाती से मानव जाती का विवाह क्या समाज को उत्तम बनाएगा ??
( वेदों के हिसाब से कभी नही बनाएगा । हा किसी नीति के तहत हो तो बात अलग है जैसे घटोतकच का इस्तेमाल महाभारत मे हुआ था)
क्या है ये वैदिक ???
नही है कदापि नही है ।।
इसलिए आर्य समाज ये वैदिक वैदिक का ढोंग करना बंद कर दे
वेद का प्रचार करना है तो सही से करे अन्यथा समाज को भ्रमित बिल्कुल भी मत करे ।।
हिन्दुओ ये तुम्हारी संस्कृति को नष्ट कर देंगे तुम्हारी छाती पर चढ़कर
अभी वक़्त है समझ लो ।।
आर्य समाज सिर्फ अपना विस्तार कर रहा है
इसमे हिन्दू हितैसी जैसी कोई बात नही है ।।
आर्य समाज एवं नास्तिको को जवाब,
दयानंद,
दयानंदभाष्य खंडनम्
असत्यवादी महाधूर्त दयानंद ( Astaywadi Mahadhurt Dayananad )
17:40 उपेन्द्र कुमार 'हिन्दू' 0 Comments
सत्यार्थ प्रकाश प्रथम समुल्लास मंगलचरण न करने का खंडन
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(प्रश्न) जैसे अन्य ग्रन्थकार लोग आदि, मध्य और अन्त में मंगलाचरण करते हैं वैसे आपने कुछ भी न लिखा, न किया?
...
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(प्रश्न) जैसे अन्य ग्रन्थकार लोग आदि, मध्य और अन्त में मंगलाचरण करते हैं वैसे आपने कुछ भी न लिखा, न किया?
...
(उत्तर) ऐसा हम को करना योग्य नहीं। क्योंकि जो आदि, मध्य और अन्त में मंगल करेगा तो उसके ग्रन्थ में आदि मध्य तथा अन्त के बीच में जो कुछ लेख होगा वह अमंगल ही रहेगा। इसलिए ‘मंगलाचरणं शिष्टाचारात् फलदर्शनाच्छ्रुतितश्चेति ।’ यह सांख्यशास्त्र का वचन है।
इस का यह अभिप्राय है कि जो न्याय, पक्षपातरहित, सत्य, वेदोक्त ईश्वर की आज्ञा है, उसी का यथावत् सर्वत्र और सदा आचरण करना मंगलाचरण कहाता है। ग्रन्थ के आरम्भ से ले के समाप्तिपर्यन्त सत्याचार का करना ही मंगलाचरण है, न कि कहीं मंगल और कहीं अमंगल लिखना।
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इस का यह अभिप्राय है कि जो न्याय, पक्षपातरहित, सत्य, वेदोक्त ईश्वर की आज्ञा है, उसी का यथावत् सर्वत्र और सदा आचरण करना मंगलाचरण कहाता है। ग्रन्थ के आरम्भ से ले के समाप्तिपर्यन्त सत्याचार का करना ही मंगलाचरण है, न कि कहीं मंगल और कहीं अमंगल लिखना।
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आर्य समाज एवं नास्तिको को जवाब,
सत्यार्थ प्रकाश का कच्चा चिठा
सनातन धर्म के दीमक- आर्य समाज ( Sanatan Dharm Ka Dimak Arya Samaj )
12:58 उपेन्द्र कुमार 'हिन्दू' 4 Commentsसाथियो, आप सभी को एक बात बताना चाहता हूँ की पिछले १५० -२०० वर्षो में सनातन धर्म को तोड़ने में जितना योगदान “आर्य
समाज” का रहा उतना किसी और का नहीं रहा ।
ये लोग खुद को वैदिक धर्म के रक्षक और प्रचारक कहते है मै आज इनसे कुछ प्रश्न पूछना चाहता हूँ –
१. आप खुद को वैदिक कहते हो और वेदो की शाखा पुराणो का विरोध करते हो क्यों ?
२. आपको कैसे पता की पुराणो में लिखी सभी बाते हमारे ऋषि मुनिओ ने ही लिखी है उनमे किसी प्रकार की कोई मिलावट नहीं हुई थी ?
आर्य समाज एवं नास्तिको को जवाब
क्या क्रांतिकारी आर्यसमाज से थे ? ( Arya Samaji Gapoda )
12:36 उपेन्द्र कुमार 'हिन्दू' 0 Comments
आर्यसमाजी गपोड़ा :
आर्यसमाजी अक्सर एक गप्प मारते हैं कि – स्वतन्त्रता आंदोलन के 80 प्रतिशत क्रांतिकारी , आर्यसमाजी थे । इनके लेखो व पत्रिकाओ मे भी ये बात देखने में आती हैं। जिनमे कि गप्प और झूठ लिख लिखकर ये स्वयं का इतना महिमामंडन करते हैं कि लगता है जैसे इस राष्ट्र के लिए व धर्म के लिए केवल और केवल आर्यसमाज ने ही कार्य किए हैं , इन्हौने ही बलिदान दिये हैं। आर्यसमाज के ही लोगो द्वारा लिखे गए झूठ से भरे पुलिंदे ही इनके लिए इतिहास का प्रमाण होते हैं। इतना और इस तरह से महिमामंडन कि युवा आर्यसमाजी तो इतने सनकी हो जाते है कि उनके दिमाग मे यह भर जाता हैं कि -स्वतन्त्रता आंदोलन में “भी” सबसे बड़ा योगदान इन्ही का था । अब इनके इस दावे की वास्तविकता देखिये —







